जुलाई 17, 2021

लालबत्ती

हिंदी कविता Hindi Kavita लालबत्ती Laalbatti

अपनी मोटर के कोमल गद्देदार सिंहासन पर,


शीतल वायु के झोकों में अहम से विराजकर,


खिड़की के बाहर तपती-चुभती धूप में झाँककर,


मैंने एक नन्हे से बालक को अपनी ओर आते देखा |



पैरों में टूटी चप्पल थी तन पर चिथड़ों के अवशेष,


मस्तक पर असंख्य बूँदें थीं लब पर दरारों के संकेत,


उसके हाथों में एक मोटे-लंबे से बाँस पर,


मैंने सतरंगी गुब्बारों को पवन में लहराते देखा |



मेरी मोटर की खिड़की से अंदर को झाँककर,


मेरी संतति की आँखों में लोभ को भाँपकर,


आशा से मेरी खिड़की पर ऊँगली से मारकर,


उसके अधरों की दरारों को मैंने गहराते देखा |



कष्टों से दूर अपनी माता के दामन को थामकर,


अपने बाबा के हाथों से एक फुग्गे को छीनकर,


जीवन को गुड्डे-गुड़ियों का खेल भर मानकर,


अपने बच्चे के चेहरे पर खुशियों को मंडराते देखा |



चंद सिक्कों को अपनी छोटी सी झोली में बाँधकर,


खुद खेलने की उम्र में पूरे कुनबे को पालकर,


दरिद्रता के अभिशाप से बचपन को ना जानकर,


अपने बीते कल को अगली मोटर तक जाते देखा ||

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