Mann Ke Bhaav offers a vast collection of Hindi Kavitayen. Read Kavita on Nature, sports, motivation, and more. Our हिंदी कविताएं, Poem, and Shayari are available online!
सतरंगी जीवन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सतरंगी जीवन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
जुलाई 29, 2021
जुलाई 17, 2021
लालबत्ती
अपनी मोटर के कोमल गद्देदार सिंहासन पर,
शीतल वायु के झोकों में अहम से विराजकर,
खिड़की के बाहर तपती-चुभती धूप में झाँककर,
मैंने एक नन्हे से बालक को अपनी ओर आते देखा |
पैरों में टूटी चप्पल थी तन पर चिथड़ों के अवशेष,
मस्तक पर असंख्य बूँदें थीं लब पर दरारों के संकेत,
उसके हाथों में एक मोटे-लंबे से बाँस पर,
मैंने सतरंगी गुब्बारों को पवन में लहराते देखा |
मेरी मोटर की खिड़की से अंदर को झाँककर,
मेरी संतति की आँखों में लोभ को भाँपकर,
आशा से मेरी खिड़की पर ऊँगली से मारकर,
उसके अधरों की दरारों को मैंने गहराते देखा |
कष्टों से दूर अपनी माता के दामन को थामकर,
अपने बाबा के हाथों से एक फुग्गे को छीनकर,
जीवन को गुड्डे-गुड़ियों का खेल भर मानकर,
अपने बच्चे के चेहरे पर खुशियों को मंडराते देखा |
चंद सिक्कों को अपनी छोटी सी झोली में बाँधकर,
खुद खेलने की उम्र में पूरे कुनबे को पालकर,
दरिद्रता के अभिशाप से बचपन को ना जानकर,
अपने बीते कल को अगली मोटर तक जाते देखा ||
जुलाई 12, 2021
सत्य क्या है?
सुख की अनुभूति,
या दुःख का अनुभव,
अंधियारी रात,
या मधुरम कलरव,
सपनों की दुनिया,
या व्याकुल वास्तव,
जीवंत शरीर,
या निर्जीव शव ||
जुलाई 04, 2021
फूल चले जाते हैं, काँटे सदा सताते हैं
छरहरी सी इक डाली पर घरौंदा अपना बसाते हैं,
कंटक के घेरे में भी, गुल खिलखिलाते हैं,
अपने रंगों की आभा से, उपवन को सजाते हैं,
मुरझाए मुखड़े पर भी, मुस्कान फ़ेर जाते हैं,
पर खुशियों के ये क्षण, दो पल को ही आते हैं,
फूल चले जाते हैं, काँटे सदा सताते हैं ||
जून 25, 2021
बुझने से पहले ज्वाला भड़के
सूरज की अलौकिक राहों में,
अंतिम डग से थोड़ा पहले,
जब पग-पग बढ़ता राही भी,
तरु छाया में थोड़ा ठहरे,
ऊष्मा की चुभन सर्वाधिक है,
बुझने से पहले ज्वाला भड़के |
दीपक के लघुतम जीवन में,
अंधियारे से थोड़ा पहले,
जब अंतिम चंद बूँदों से,
बाती के रेशे होते सुनहरे,
ज्योति की जगमग सर्वाधिक है,
बुझने से पहले ज्वाला भड़के |
ऋतुओं के निरंतर फेरे में,
बसंती बयारों के पहले,
कोहरे के घने कंबल में,
जब दिन में भी दिनकर ना दीखे,
शिशिर की शीतलता सर्वाधिक है,
बुझने से पहले ज्वाला भड़के |
किसी मृदु-मनोहारी मंचन में,
पटाक्षेप से थोड़ा पहले,
जब उन्मुक्त निमग्न रंगकर्मी,
रहस्य की परतों को खोले,
दर्शक का रोमांच सर्वाधिक है,
बुझने से पहले ज्वाला भड़के |
गंतव्यपथ पर चलते-चलते,
शिखर छूने से थोड़ा पहले,
ध्येय को तलाशती राहों पर,
जब दृढ़-संकल्प भी डोले,
राह की जटिलता सर्वाधिक है,
बुझने से पहले ज्वाला भड़के |
जीवन की अनूठी यात्रा के,
समापन से थोड़ा पहले,
जब तन से रूह का बंधन भी,
झीनी सी डोरी से ही झूले,
जीने की चाह सर्वाधिक है,
बुझने से पहले ज्वाला भड़के ||
जून 13, 2021
अधूरा प्यार
लब पर तेरे मेरा नाम नहीं आता है,
जो मैं पुकारूँ फिर भी तेरा पैगाम नहीं आता है,
जग के समक्ष मुझको तू जब-जब बदनाम करती है,
जानता हूँ दिल-ही-दिल में आह भरती है,
दस्तूर दुनिया का बदल सकते नहीं हैं हम,
इक-दूजे संग चाहकर भी जी सकते नहीं हैं हम ||
जून 07, 2021
अल्पविराम,
वक्त के पहियों से भी गतिमान थी ज़िंदगी,
वक्त की भांति ही सतत चलायमान थी ज़िंदगी,
वक्त के पहिये ने रुख ऐसा अपना मोड़ लिया,
रैन के उपरांत सूरज ने निकलना छोड़ दिया,
कष्टों के सैलाब में इंसान मानो बह गया,
जो जहाँ था वो वहीँ पर बस, रह गया,
आस है तम को भेदती फिर घाम हो,
पूर्ण नहीं ये जीवन का बस एक अल्पविराम हो ||
जून 02, 2021
क्षणभंगुर प्रत्येक तमाशा है
जब नभ पर बहता बादल भी,
बरखा बनकर ढह जाता है,
जब दिनभर जलता दिनकर भी,
संध्या होते ढल जाता है,
जब विध्वंसक सैलाब भी,
साहिल तक फिर थम जाता है,
जब दीनहीन कोई रंक भी,
श्रम से राजा बन जाता है,
जब निर्बल नश्वर हर इक जीव,
कालान्तर में मर जाता है |
तो चहुँ ओर तम को पाकर,
तू व्यर्थ क्यों घबराता है ?
और सुख-समृद्धि से तर हो,
दंभी कैसे बन जाता है?
अपने प्रियजन को खोकर,
शोकाकुल क्यों हो जाता है?
सतत अटूट सत्य परिवर्तन,
स्थिरता सिर्फ़ छलावा है,
चिरकालीन यहाँ कुछ भी नहीं,
क्षणभंगुर प्रत्येक तमाशा है ||
मई 27, 2021
कतार
फल-सब्ज़ी और राशन की खातिर मारा-मार है,
सब व्यवसाय ठप, केवल इनमें ही व्यापार है,
प्राणों को वायु नहीं, प्राणवायु की दरकार है,
सिलेण्डर अब अलग है, पर लगती वही कतार है,
अस्पतालों पर पीड़ित रुग्णों का प्रचंड भार है,
दवा तो मिलती नहीं, दारू की भरमार है,
ज़िंदों की तो छोड़ो, मुर्दों में भी तकरार है,
श्मशानों में भी लगती, लंबी-लंबी कतार है ||
मई 23, 2021
ए माया ! तू क्या करती है ?
ए माया ! तू क्या करती है ?
सुख के लम्हों को हरती है,
पुलकित मन में गम भरती है,
माथे की लाली हरती है,
भरी कोख सूनी करती है,
पालक का साया हरती है,
जीते-जी मुर्दा करती है,
अल्पायु में प्राण हरती है,
ए माया ! तू क्या करती है ?
मई 17, 2021
बहते-बहते एकाएक वक़्त कितना बदल जाता है
सुसज्जित जिन बाजारों में,
गलियों में और चौबारों में,
बहती थी जीवन की धारा,
रहता अस्पष्ट सा एक शोर,
बसता था मानव का मेला,
क्रय-विक्रय की बेजोड़ होड़ |
वहाँ पसरा अब सन्नाटा है,
दहशत से कोई ना आता है,
अपने ही घर में हर कोई,
खुद को बंदी अब पाता है,
बहते-बहते एकाएक,
वक़्त कितना बदल जाता है |
वीरान उन मैदानों में,
कब्रिस्तानों में श्मशानों में,
एकाध ही दिन में आता था,
संग अपने समूह लाता था,
विस्तृत विभिन्न रीतियों से,
माटी में वह मिल जाता था |
वहाँ मृतकों का अब तांता है,
संबंधी संग ना आता है,
अंतिम क्षणों में भी देह,
समुचित सम्मान ना पाता है,
बहते-बहते एकाएक,
वक़्त कितना बदल जाता है |
शहर के उन बागानों में,
युगलों की पनाहगाहों में,
जहाँ चलते थे बल्ला और गेंद,
सजती थी यारों की महफ़िल,
खिलते थे विविधाकर्षक फ़ूल ,
जो थे सप्ताहांत की मंज़िल |
वहाँ सजती अब चिताएँ हैं,
मरघट बनी वाटिकाएँ हैं,
अस्थि के फूलों को चुनकर,
कलशों में समेटा जाता है,
बहते-बहते एकाएक,
वक़्त कितना बदल जाता है |
आधुनिक दवाखानों में,
खूब चलती उन दुकानों में,
रोगों के भिन्न प्रकार थे,
उतने ही अलग उपचार थे,
आशा से रोगी जाता था,
अक्सर ठीक होकर आता था |
वहाँ बस अब एक ही रोग है,
जिसका ना कोई तोड़ है,
उखड़ती साँसों से बोझिल,
स्थापित तंत्र लड़खड़ाता है,
बहते-बहते एकाएक,
वक़्त कितना बदल जाता है |
कोलाहली कारखानों में,
व्यवसायिक प्रतिष्ठानों में,
दूरस्थ स्थानों के बाशिंदे,
करते थे श्रम दिन और रात,
रहता था मस्तक पर पसीना,
मन में सुखमय जीवन की आस |
वहाँ उड़ती अब धूल है,
मरना किसको कबूल है,
नगरों से वापस अपने गाँव,
पैदल ही जत्था जाता है,
बहते-बहते एकाएक,
वक़्त कितना बदल जाता है |
टूटी-फूटी उन सड़कों पर,
गुफा समतुल्य गड्ढों पर,
चलते थे वाहन कई प्रकार,
रहती थी दिनभर भीड़-भाड़,
इक-दूजे से आगे होने में,
होती थी अक्सर तकरार |
वो सड़कें सारी कोरी हैं,
ना वाहन है ना बटोही है,
अब अक्सर उन मार्गों पर,
रसायन छिड़का जाता है,
बहते-बहते एकाएक,
वक़्त कितना बदल जाता है |
विद्या के उन संस्थानों में,
शिक्षण प्रतिष्ठानों में,
जहाँ हरदम चहकते चेहरे थे,
दोस्ती के रिश्ते गहरे थे,
शिक्षा का प्रसाद मिलता था,
कलियों से फूल खिलता था |
वहाँ लटका अब ताला है,
ना कोई पढ़नेवाला है,
ज्ञान के अनुयायियों का,
दूभर-दुष्कर हर रास्ता है,
बहते-बहते एकाएक,
वक़्त कितना बदल जाता है |
छोटे-बड़े परिवारों में,
घरों में, त्योहारों में,
लोगों का आना-जाना था,
मिलने का सदा बहाना था,
सुख-दुःख के सब साथी थे,
हर मोड़ पर साथ निभाते थे |
अब सब घरों में बंद हैं,
ना मिलते हैं, ना संग हैं,
घर ही दफ़्तर कहलाता है,
कोई कहीं ना जाता है,
बहते-बहते एकाएक,
वक़्त कितना बदल जाता है ||
मई 09, 2021
ऐसी मेरी जननी थी
मुझको भरपेट खिलाकर,
वो खुद भूखी रह लेती थी,
ऐसी मेरी जननी थी |
मेरी तकलीफ़ मिटाकर,
खुद दर्द वो सह लेती थी,
ऐसी मेरी जननी थी |
अपनी ख्वाहिश दबाकर,
ज़िद मेरी पूरी करती थी,
ऐसी मेरी जननी थी |
मेरी मासूम भूलों को,
वो अपने सर मढ़ लेती थी,
ऐसी मेरी जननी थी |
गर कीटों से मैं डर जाऊं,
झाड़ू उनपर धर देती थी,
ऐसी मेरी जननी थी |
मेरी हल्के से ज्वर पर भी,
सारी रात जग लेती थी,
ऐसी मेरी जननी थी |
रुग्णावस्था में बेदम भी,
मुझको गोदी भर लेती थी,
ऐसी मेरी जननी थी |
अपने आँचल के कोने से,
मेरे सब गम हर लेती थी,
ऐसी मेरी जननी थी |
मेरी बदतमीज़ी पर वो,
भर-भर कर मुझको धोती थी,
ऐसी मेरी जननी थी |
गर पढ़ते-पढ़ते सुस्ताऊं,
वो दो कस के धर देती थी,
ऐसी मेरी जननी थी |
मुझको थप्पड़ मारकर,
खुद चुपके से रो लेती थी,
ऐसी मेरी जननी थी |
बाहर के लोगों से मेरी,
गलती पर भी लड़ लेती थी,
ऐसी मेरी जननी थी |
मेरे खोए सामान को,
वो चुटकी में ला कर देती थी,
ऐसी मेरी जननी थी |
आने वाले कल की ख़ातिर,
दूरी मुझसे सह लेती थी,
ऐसी मेरी जननी थी |
तू जमकर बस पढ़ाई कर,
चिठ्ठी उसकी यह कहती थी,
ऐसी मेरी जननी थी |
छुट्टी में घर जाने पर वो,
मेरी खिदमत में रहती थी,
ऐसी मेरी जननी थी |
मेरी बातों के फेर में,
वो बस यूँ ही बह लेती थी,
ऐसी मेरी जननी थी |
मेरी शादी से भी पहले,
कपड़े नन्हे बुन लेती थी,
ऐसी मेरी जननी थी |
मृत्युशय्या पर होकर भी,
मुझको हँसने को कहती थी,
ऐसी मेरी जननी थी |
उसके जाने के बाद भी,
उसकी ज़रूरत रहती है,
ऐसी मेरी जननी थी ||
मई 06, 2021
क्या पाया, तूने मानव ?
दो पैरों पर सीधा चलके,
वस्त्रों को धारण करके,
कंदराओं से निकलके,
क्या पाया, तूने मानव ?
सरिता में विष मिलाकर,
तरुवर की छाँव मिटाकर,
नगरों में खुद को बसाकर,
क्या पाया, तूने मानव ?
निर्बल पर बल चलाकर,
रुधिर को व्यर्थ बहाकर,
दौलत को खूब जुटाकर ,
क्या पाया, तूने मानव ?
परमार्थ को भुलाकर,
कुकर्मों को अपनाकर,
दमन के पथ पर जाकर,
क्या पाया, तूने मानव ?
मई 01, 2021
गंतव्यपथ
बढ़ते-बढ़ते जब खुद को तुम,
भटका हुआ पाओगे,
अंधियारे में मंज़िल की,
राहों से खो जाओगे,
हालातों से हारकर जब तुम,
बस रुकना चाहोगे |
हिम्मत को अपनी बाँध बस तुम,
आगे बढ़ते जाना,
लक्ष्य की सिद्धी से पहले,
खुद-ब-खुद मत रुक जाना,
क्या मालूम दो पग आगे ही,
लिखा हो मंज़िल पाना ||
अप्रैल 15, 2021
ये इमारत !
नवयौवन के आँगन में,
सौंदर्य के परचम पर,
अनुपम रंगो को कर धारण,
अभिमान का बन उदाहरण,
अपने ही आकर्षण से अभिभूत,
कैसे गौरवान्वित हो रही है ये इमारत !
अपराह्न की बेला में,
गफलत के सबब से,
रूप-रंग थोड़ा है बाकी,
गुज़रे लम्हों का है साक्षी,
बनकर अपनी बस एक झाँकी,
कैसे जीर्ण-क्षीण हो रही है ये इमारत !
कभी कौतूहल का कारण बनी,
खिदमतगारों से रही पटी,
आज खंडहर हो चली है,
सूखे पत्तों की डली है,
माटी में मिलने को आतुर,
कैसे छिन्न-भिन्न हो रही है ये इमारत !
मार्च 29, 2021
होली
जीवन में सबके घुल जाएँ खुशियों के हज़ारों रंग,
घृणा रोग सब मिट जाएँ, छाए चहुँ ओर उल्लास उमंग |
मार्च 21, 2021
नुक्कड़
गली के नुक्कड़ पर रोज़,
उनके रूबरू आता हूँ |
फासले इतने हैं मगर ,
कुछ भी कह ना पाता हूँ ||
मार्च 14, 2021
मैं हँसना भूल गया
जब बचपन के मेरे बंधु ने,
चिर विश्वास के तंतु ने,
पीछे से खंजर मार कर,
मेरा भरोसा तोड़ दिया,
मैं हँसना भूल गया |
जब मेरे दफ़्तर में ऊँचे,
पद पर आसीन साहब ने,
मेरे श्रम को अनदेखा कर,
चमचों से नाता जोड़ लिया,
मैं हँसना भूल गया |
जब जन्मों के मेरे साथी ने,
सुख और दुःख के हमराही ने,
दुःख के लम्हों को आता देख,
साथ निभाना छोड़ दिया,
मैं हँसना भूल गया |
जब वर्षों तक सींचे पौधे ने,
उस मेरे अपने बालक ने,
छोटी-छोटी सी बातों पर,
मेरा भर-भर अपमान किया,
मैं हँसना भूल गया |
जिसकी गोदी में रहता था,
जब उस प्यारे से चेहरे ने,
मेरी लाई साड़ी को छोड़,
श्वेत कफ़न ओढ़ लिया,
मैं हँसना भूल गया |
जब मंज़िल की ओर अग्रसर,
पहले से मुश्किल राहों को,
नियति की कुटिल चाल ने,
हर-हर बार मरोड़ दिया,
मैं हँसना भूल गया |
मार्च 11, 2021
क्या देखूँ मैं ?
रिमझिम बरखा के मौसम में,
घोर-घने-गहरे कानन में,
मेरे नैनों के दर्पण में,
छवि अनोखी गोचर होती –
रंगों की कान्ति से उज्जवल,
सरिता की धारा सा अविरल,
डैनों के नर्तन, की संगी
दो भद्दी फूहड़ टहनियाँ !
लहराते पंखों की शोभा,
या बेढब पैरों की डगमग,
क्या देखूँ मैं ?
माटी के विराट गोले पर,
माया की अद्भुत क्रीड़ा में,
मेरे नैनों के दर्पण में,
छवि अनोखी गोचर होती –
बहती बयार की भांति
जीवनधारा, के हमराही
सुख के लम्हों, का साथी
किंचित कष्टों का रेला है !
हर्षित मानव का चेहरा,
या पीड़ित पुरुष अकेला,
क्या देखूँ मैं ?
पल दो पल की इन राहों में,
वैद्यों के विकसित आलय में,
मेरे नैनों के दर्पण में,
छवि अनोखी गोचर होती –
इत गुंजित होती किलकारी,
अंचल में नटखट अवतारी,
उत शोकाकुल क्रन्दनकारी,
बिछोह के गम से मन भारी !
उत्पत्ति का उन्मुक्त उत्सव,
या विलुप्ति का व्याकुल वास्तव,
क्या देखूँ मैं ?
जनमानस के इस जमघट में,
द्वैत के इस द्वंद्व में,
मेरे नैनों के दर्पण में,
छवि अनोखी गोचर होती –
इस ओर करुणा का सागर,
दीनों के कष्टों के तारक,
उस ओर पापों की गागर,
स्वर्णिम मृग रुपी अपकारक !
उपकारी सत के साधक,
या जग में तम के वाहक,
क्या देखूँ मैं ?
मेरे अंत:करण के भीतर,
चित्त की गहराइयों के अंदर,
मन के नैनों के दर्पण में,
छवि अनोखी गोचर होती –
इक सुगंधित मनोहर फुलवारी,
कंटक से डाली है भारी,
काँटों से विचलित ना होकर,
गुल पर जाऊं मैं बलिहारी !
पवन के झोकों में रहकर,
भी निर्भीक जलते दीपक,
को देखूँ मैं !
फ़रवरी 18, 2021
टूटा दिल
गलती मेरी थी जो मैंने तुझसे कुछ उम्मीद की,
उसको पूरा करने की तुझसे मैंने ताकीद की ||
सदस्यता लें
संदेश (Atom)