content='width=device-width, initial-scale=1' /> मन के भाव - हिंदी काव्य संकलन Mann ke Bhaav : Hindi Kavita: क्यों है मानव इतना अधीर ?

अगस्त 20, 2020

क्यों है मानव इतना अधीर ?

क्यों है मानव इतना अधीर ?



हिंसा का करे अभ्यास,


प्रकृति का करे विनाश,


अणु-अणु करके विखंडित,


ऊष्मा का करे विस्फोट,


स्वजनों पर करे अत्याचार,


लकीरों से धरा को चीर,


क्यों है मानव इतना अधीर ?



ट्रेनों में चढ़ती भीड़,


ना समझे किसीकी पीड़,


रनवे पे उतरे विमान,


उठ भागे सीट से इंसान,


बेवजह लगाए कतार,


मानो बंटती आगे खीर,


क्यों है मानव इतना अधीर ?



उड़ती जब-जब पतंग,


स्वच्छंद आज़ाद उमंग,


करती घायल उसकी डोर,


जो थी काँच से सराबोर,


खेल-खेल में होड़ में,


धागे को बनाता नंगा शमशीर,


क्यों है मानव इतना अधीर ?



नवीन नादान निर्दोष मन,


चहकती आँखें कोमल तन,


डाल उनपर आकांशाओं का भार,


करता बालपन का संहार,


थोपता फैसले अपने हर बार,


समझता उनको अपनी जागीर,


क्यों है मानव इतना अधीर ?



तारों को छूने की चाह में,


वशीभूत सृष्टि की थाह में,


वन-वसुधा-वायु में घोले विष,


बेवजह करे प्रकृति से रंजिश,


ना समझे कुदरत के इशारे,


कर्मफल के प्रति ना है गंभीर,


क्यों है मानव इतना अधीर ?



दौर यह अद्वितीय आया है,


दो गज की दूरी लाया है,


सदियों से परदे में नारी,


आज नर ने साथ निभाया है,


कुछ निर्बुद्धि निरंकुश निराले नर,


तोड़ें नियम समझें खुद को वीर,


क्यों है मानव इतना अधीर ?

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें